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. D.K. Basu v. State of West Bengal
Citation: (1997) 1 SCC 416
Principle laid down:
The Supreme Court held that police powers must be exercised fairly and without harassment or illegal detention. Any unnecessary restraint or coercive treatment of witnesses/persons violates Articles 21 and 22 of the Constitution.
Relevance to Section 191 BNSS:
Supports the principle that complainants and witnesses cannot be subjected to unnecessary inconvenience or illegal custody by police.
. Shamshul Kanwar v. State of U.P.
सिद्धांत:
Case diary स्वयं substantive evidence नहीं होती।
कोर्ट इसे केवल जांच में सहायता (aid) के लिए उपयोग कर सकती है।
महत्त्व:
धारा 192(4) BNSS की व्याख्या का महत्वपूर्ण निर्णय।
Section 193 BNSS (Report of Police Officer on Completion of Investigation) corresponds to old Section 173 CrPC. इसलिए Section 173 CrPC पर दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय Section 193 BNSS पर भी लागू माने जाते हैं।
Landmark Judgments on Section 193 BNSS
1. Vinubhai Haribhai Malaviya v. State of Gujarat
Principle:
Magistrate further investigation का आदेश दे सकता है, even after cognizance is taken and chargesheet filed.
Court ने कहा कि न्यायहित में further investigation किसी भी stage पर आवश्यक हो सकती है.
2. Reeta Nag v. State of West Bengal
Principle:
Final report/chargesheet दाखिल होने के बाद police further investigation कर सकती है, लेकिन Magistrate की permission आवश्यक है.
यह principle अब Section 193(9) BNSS में भी reflected है.
3. Bhagwant Singh v. Commissioner of Police
Principle:
यदि police closure report देती है, तो Magistrate complainant/informant को सुनवाई का अवसर देगा.
Natural justice का महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया गया।
4. Abhinandan Jha v. Dinesh Mishra
Principle:
Magistrate police को chargesheet दाखिल करने के लिए compel नहीं कर सकता।
Investigation police का domain है; Magistrate केवल judicial scrutiny कर सकता है।
5. CBI v. Rajesh Gandhi
Principle:
Accused को यह अधिकार नहीं कि वह तय करे कौन-सी agency investigation करेगी।
Investigation executive function है।
6. Gajendra Singh Shekhawat v. State of Rajasthan
Principle:
BNSS Section 193(9) के अनुसार chargesheet/filed report के बाद further investigation बिना Trial Court की prior permission के नहीं हो सकती.
Important Points under Section 193 BNSS
Investigation बिना unnecessary delay पूरी होनी चाहिए।
POCSO और sexual offences की investigation 2 months में पूरी करना आवश्यक।
Chargesheet/police report electronically भी भेजी जा सकती है।
Victim को 90 days में investigation progress बताना आवश्यक।
Further investigation के लिए Trial Court की permission आवश्यक।
Criminal Procedure Law के अंतर्गत BNSS की धारा 194, पुरानी CrPC की धारा 174 के समकक्ष है। यह “असामान्य मृत्यु (suicide, accident, suspicious death आदि) पर पुलिस जांच एवं पंचनामा” से संबंधित है।
धारा 194 BNSS के प्रमुख Landmark Judgments
1. Pedda Narayana v. State of Andhra Pradesh
सिद्धांत:
धारा 174 CrPC (अब BNSS धारा 194) के तहत तैयार की गई Inquest Report का उद्देश्य केवल मृत्यु के कारण एवं शरीर पर चोटों का प्रारंभिक विवरण दर्ज करना है।
यह विस्तृत साक्ष्य (Evidence) का विकल्प नहीं है।
महत्व:
FIR या चार्जशीट जैसी विस्तृत जांच नहीं मानी जाएगी।
Inquest report में हर छोटी बात का उल्लेख आवश्यक नहीं।
2. Shakila Khader v. Nausher Gama
सिद्धांत:
Inquest report का उद्देश्य यह पता लगाना है कि मृत्यु स्वाभाविक, आत्महत्या, दुर्घटना या हत्या है।
यह रिपोर्ट केवल प्रारंभिक जांच होती है।
महत्व:
पंचनामा में गवाहों के विस्तृत बयान आवश्यक नहीं।
केवल apparent cause of death महत्वपूर्ण है।
3. Amar Singh v. Balwinder Singh
सिद्धांत:
यदि Inquest report में कुछ तथ्य छूट जाएँ, तो मात्र इसी आधार पर अभियोजन (prosecution) असफल नहीं होगा।
महत्व:
Inquest report substantive evidence नहीं है।
Trial में मौखिक एवं वैज्ञानिक साक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण हैं।
4. George v. State of Kerala
सिद्धांत:
धारा 174/194 का उद्देश्य अपराधी तय करना नहीं बल्कि मृत्यु की प्रकृति जानना है।
महत्व:
पुलिस का प्रारंभिक दायित्व केवल मृत्यु की परिस्थितियों का पता लगाना है।
विस्तृत दोष निर्धारण बाद की जांच में होता है।
धारा 194 BNSS का सार
असामान्य मृत्यु की सूचना मिलने पर पुलिस तुरंत कार्यवाही करेगी।
Executive Magistrate को सूचना दी जाएगी।
पंचनामा (Inquest Report) तैयार होगा।
शरीर पर चोट, घाव, मृत्यु का कारण आदि दर्ज किए जाएंगे।
आवश्यकता होने पर पोस्टमार्टम कराया जाएगा।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
| बिंदु | सिद्धांत |
|---|---|
| Inquest Report | प्रारंभिक जांच |
| उद्देश्य | मृत्यु का कारण जानना |
| Evidence Value | सीमित |
| विस्तृत साक्ष्य | Trial में देखा जाता है |
यदि आप “न्यायालय की गवाह/व्यक्ति को तलब करने की शक्ति” वाली धारा की बात कर रहे हैं, तो यह धारा 348 BNSS, 2023 (पुरानी धारा 311 CrPC) है, न कि धारा 195।
इस विषय पर प्रमुख Landmark Judgments निम्न हैं:
1. Zahira Habibullah Sheikh v. State of Gujarat
सिद्धांत:
न्यायालय केवल “मूक दर्शक” नहीं है।
सत्य तक पहुँचने के लिए कोर्ट आवश्यक गवाह को बुला सकती है।
निष्पक्ष ट्रायल (Fair Trial) सर्वोपरि है।
महत्व:
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि न्याय के लिए आवश्यक हो तो कोर्ट किसी भी चरण में गवाह बुला सकती है।
2. Mohanlal Shamji Soni v. Union of India
सिद्धांत:
धारा 311 CrPC (अब 348 BNSS) का उद्देश्य “सत्य की खोज” है।
कोर्ट को व्यापक शक्ति प्राप्त है।
न्यायालय आवश्यक होने पर किसी भी व्यक्ति को गवाह के रूप में बुला सकती है।
महत्वपूर्ण कथन:
“Ends of justice are more important than procedural technicalities.”
3. Rajaram Prasad Yadav v. State of Bihar
सिद्धांत:
गवाह को बुलाने की शक्ति का प्रयोग न्यायहित में होना चाहिए।
इसका उपयोग prosecution या defence की कमी (lacuna) भरने के लिए नहीं होना चाहिए।
यदि साक्ष्य न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक हो, तो कोर्ट को गवाह बुलाना चाहिए।
4. Hanuman Ram v. State of Rajasthan
सिद्धांत:
धारा दो भागों में विभाजित है:
“May” → न्यायालय का विवेकाधिकार
“Shall” → आवश्यक साक्ष्य होने पर न्यायालय का कर्तव्य
यदि साक्ष्य न्याय के लिए आवश्यक हो, तो कोर्ट को गवाह बुलाना अनिवार्य है।
5. Varsha Garg v. State of Uttar Pradesh
सिद्धांत:
केवल देरी होने के आधार पर गवाह recall करने से मना नहीं किया जा सकता।
न्यायालय का मुख्य उद्देश्य सत्य एवं निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है।
परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु
कोर्ट किसी भी चरण में गवाह बुला सकती है।
शक्ति का उद्देश्य “Just Decision of the Case” है।
यह शक्ति बहुत व्यापक (Wide & Plenary) है।
इसका दुरुपयोग पक्षकार की कमी पूरी करने हेतु नहीं होना चाहिए।
धारा 195 BNSS, 2023 — “Power to Summon Persons”
यह धारा पुलिस अधिकारी को जाँच के दौरान ऐसे व्यक्तियों को बुलाने (summon) की शक्ति देती है जो मामले के तथ्यों से परिचित हों। यह पुरानी धारा 175 CrPC के समकक्ष है।
प्रमुख बिंदु
पुलिस लिखित आदेश द्वारा व्यक्ति को बुला सकती है।
व्यक्ति को सत्य उत्तर देना होगा।
स्वयं को अपराध में फँसाने वाले प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
15 वर्ष से कम, 60 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष, महिला, दिव्यांग या गंभीर रोगी को उनके निवास स्थान के अतिरिक्त अन्यत्र उपस्थित होने हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा।
Landmark Judgments (Hindi)
1. Nandini Satpathy v. P.L. Dani
सिद्धांत:
पुलिस पूछताछ के दौरान व्यक्ति को मौन रहने का अधिकार (Right to Silence) प्राप्त है।
किसी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
Article 20(3) का संरक्षण पुलिस जाँच के दौरान भी लागू होता है।
महत्व:
धारा 195 BNSS के अंतर्गत बुलाए गए व्यक्ति को ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिससे वह स्वयं अपराध में फँस जाए।
2. State of Bombay v. Kathi Kalu Oghad
सिद्धांत:
“Self-incrimination” का अर्थ है स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देना।
व्यक्ति को अपने विरुद्ध मौखिक स्वीकारोक्ति हेतु विवश नहीं किया जा सकता।
महत्व:
धारा 195 के तहत पूछताछ करते समय पुलिस की शक्ति सीमित है और संवैधानिक सुरक्षा लागू रहती है।
3. D.K. Basu v. State of West Bengal
सिद्धांत:
पुलिस जाँच और पूछताछ के दौरान मानवाधिकारों की रक्षा आवश्यक है।
पुलिस शक्ति का दुरुपयोग नहीं कर सकती।
महत्व:
धारा 195 BNSS के अंतर्गत बुलाए गए व्यक्ति के साथ विधिसम्मत व्यवहार अनिवार्य है।
4. Joginder Kumar v. State of Uttar Pradesh
सिद्धांत:
पुलिस शक्ति असीमित नहीं है।
किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान या हिरासत में नहीं लिया जा सकता।
महत्व:
सिर्फ summon जारी होने से व्यक्ति अपराधी नहीं माना जाएगा।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
धारा 195 BNSS = पुरानी धारा 175 CrPC
पुलिस केवल जाँच हेतु व्यक्ति को बुला सकती है।
आत्म-अभिशंसन (Self-Incrimination) से संरक्षण उपलब्ध है।
महिला, वृद्ध, दिव्यांग एवं बीमार व्यक्तियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है।
पुलिस शक्ति न्यायसंगत एवं संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।
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