Section 198 to 205
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धारा 198 BNSS, 2023 — अभियुक्त की उपस्थिति में साक्ष्य लेना (Evidence in Presence of Accused)
धारा 198 BNSS: साक्ष्य सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति में लिया जाएगा
धारा 198 BNSS का सार
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 की धारा 198 के अनुसार—
प्रत्येक साक्ष्य सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति में दर्ज किया जाएगा।
यदि अभियुक्त के विरुद्ध कई आरोपी हों, तो उनके अधिवक्ता की उपस्थिति भी पर्याप्त मानी जा सकती है।
यह प्रावधान निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के सिद्धांत पर आधारित है।
अभियुक्त को यह अधिकार है कि वह:
गवाहों को सुन सके,
जिरह (Cross-examination) कर सके,
अपने विरुद्ध साक्ष्य को चुनौती दे सके।
धारा 198 का उद्देश्य
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Principles of Natural Justice) की रक्षा
अभियुक्त को उचित अवसर प्रदान करना
गुप्त या एकपक्षीय साक्ष्य को रोकना
निष्पक्ष आपराधिक न्याय सुनिश्चित करना
Landmark Judgements
1. State of Maharashtra v. Praful B. Desai
सिद्धांत
उच्चतम न्यायालय ने माना कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही लेना भी अभियुक्त की “उपस्थिति” माना जा सकता है।
महत्व
आधुनिक तकनीक को वैध मान्यता मिली।
यदि अभियुक्त और अधिवक्ता को जिरह का अवसर मिलता है, तो न्यायसंगत प्रक्रिया मानी जाएगी।
2. Basavaraj R. Patil v. State of Karnataka
सिद्धांत
न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक कार्यवाही में अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य नहीं है, यदि अधिवक्ता उपस्थित हो और न्यायहित प्रभावित न हो।
महत्व
व्यावहारिक न्याय (Practical Justice) को महत्व।
अनावश्यक विलंब रोकने का प्रयास।
3. Atma Ram v. State of Rajasthan
सिद्धांत
यदि अभियुक्त को गवाहों से जिरह का अवसर नहीं दिया गया, तो यह निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होगा।
महत्व
Cross-examination को न्याय का आवश्यक भाग माना गया।
अभियुक्त के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा।
धारा 198 BNSS — Flow Chart
साक्ष्य प्रस्तुत किया गया
│
▼
क्या अभियुक्त उपस्थित है?
│
┌────────┴────────┐
│ │
हाँ नहीं
│ │
▼ ▼
साक्ष्य दर्ज क्या अधिवक्ता उपस्थित है?
किया जाएगा │
├────► हाँ → कार्यवाही जारी
│
└────► नहीं → न्यायालय उचित आदेश देगा
महत्वपूर्ण बिंदु
साक्ष्य सामान्यतः अभियुक्त की उपस्थिति में लिया जाएगा।
अभियुक्त को जिरह का अधिकार प्राप्त है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग वैध माध्यम हो सकता है।
निष्पक्ष सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ी है।
धारा 198 BNSS, 2023 — जाँच एवं विचारण का स्थान (Place of Inquiry and Trial)
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 की धारा 198 यह निर्धारित करती है कि किसी अपराध की जाँच (Inquiry) और विचारण (Trial) सामान्यतः उस न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिसकी स्थानीय अधिकारिता (Local Jurisdiction) में अपराध किया गया हो।
अपराध जहाँ किया गया हो, सामान्यतः वहीं जाँच एवं विचारण होगा
धारा 198 का मुख्य सिद्धांत
सामान्य नियम
अपराध जिस स्थान पर हुआ है, उसी क्षेत्र के न्यायालय को अधिकार होगा।
इसे Territorial Jurisdiction कहा जाता है।
उद्देश्य
साक्ष्य एकत्र करने में सुविधा
गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करना
निष्पक्ष एवं त्वरित न्याय
न्यायालयीय अधिकारिता में स्पष्टता
महत्वपूर्ण Landmark Judgements
1. Satvinder Kaur v. State (Govt. of NCT of Delhi)
सिद्धांत
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि FIR दर्ज करने के समय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) का प्रश्न प्रारंभिक बाधा नहीं बन सकता।
महत्व
पुलिस पहले जांच कर सकती है।
बाद में उचित न्यायालय/थाने को मामला स्थानांतरित किया जा सकता है।
2. Navinchandra N. Majithia v. State of Meghalaya
सिद्धांत
यदि अपराध के विभिन्न हिस्से अलग-अलग स्थानों पर घटित हुए हों, तो उन सभी स्थानों के न्यायालयों को अधिकारिता प्राप्त हो सकती है।
महत्व
Continuing offence और multi-location offences में मार्गदर्शक निर्णय।
साइबर अपराध और आर्थिक अपराधों में अत्यंत महत्वपूर्ण।
3. Y. Abraham Ajith v. Inspector of Police
सिद्धांत
जिस स्थान पर अपराध का कोई भी आवश्यक घटक (Essential Ingredient) घटित नहीं हुआ हो, उस क्षेत्र के न्यायालय को विचारण का अधिकार नहीं होगा।
महत्व
झूठे या दूरस्थ क्षेत्र में मुकदमे दायर करने पर रोक।
Territorial nexus को आवश्यक माना गया।
धारा 198 BNSS — Flow Chart
अपराध घटित हुआ
│
▼
अपराध किस क्षेत्र में हुआ?
│
▼
उसी क्षेत्र के न्यायालय को
जाँच एवं विचारण का अधिकार
│
▼
क्या अपराध कई स्थानों पर हुआ?
│
┌──────┴──────┐
│ │
हाँ नहीं
│ │
▼ ▼
किसी भी संबंधित उसी न्यायालय में
क्षेत्र का न्यायालय विचारण
विचारण कर सकता है
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
सामान्य नियम: अपराध जहाँ हुआ, वहीं trial होगा।
Multi-jurisdiction offences में एक से अधिक न्यायालय सक्षम हो सकते हैं।
FIR दर्ज करने में प्रारंभिक क्षेत्राधिकार बाधा नहीं है।
Essential ingredients doctrine महत्वपूर्ण है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
धारा 198 BNSS न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध की जांच और विचारण उचित क्षेत्र में हो, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावी, निष्पक्ष और सुविधाजनक बन सके।
धारा 199 BNSS, 2023 — अभियोजन के लिए पर्याप्त आधार न होने पर आरोपी की रिहाई
धारा 199 BNSS का सार
यदि साक्ष्य अपर्याप्त हो ⇒ आरोपी को रिहा किया जाएगा
धारा 199 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में यह प्रावधान है कि जब मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिस रिपोर्ट, केस डायरी तथा उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने पर यह प्रतीत हो कि आरोपी के विरुद्ध आगे कार्यवाही चलाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तब मजिस्ट्रेट आरोपी को रिहा (Discharge/Release) कर सकता है।
यह प्रावधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु बनाया गया है ताकि बिना पर्याप्त साक्ष्य के किसी व्यक्ति को अनावश्यक मुकदमे में न घसीटा जाए।
धारा 199 BNSS के मुख्य बिंदु
पुलिस रिपोर्ट एवं दस्तावेजों का परीक्षण किया जाता है।
मजिस्ट्रेट उपलब्ध साक्ष्य का मूल्यांकन करता है।
यदि प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है, तो आरोपी को रिहा किया जा सकता है।
आदेश कारण सहित (Reasoned Order) होना चाहिए।
यदि पर्याप्त आधार हो तो आगे आरोप निर्धारण की प्रक्रिया चलेगी।
प्रक्रिया (Flow Chart)
पुलिस रिपोर्ट / केस डायरी प्रस्तुत
↓
मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलेखों का परीक्षण
↓
क्या आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त आधार है?
↓ ↓
नहीं हाँ
↓ ↓
आरोपी रिहा आरोप निर्धारण
(Section 199 BNSS) एवं ट्रायल
महत्वपूर्ण Landmark Judgments
1. Union of India v. Prafulla Kumar Samal
सिद्धांत
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आरोप तय करने या आरोपी को discharge करने के समय न्यायालय केवल यह देखता है कि:
क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है?
क्या अभियोजन सामग्री से गंभीर संदेह उत्पन्न होता है?
यदि सामग्री अत्यंत कमजोर हो और दोष सिद्ध होने की संभावना न हो, तो आरोपी को discharge किया जा सकता है।
महत्व
यह निर्णय discharge के सिद्धांतों का प्रमुख मार्गदर्शक निर्णय माना जाता है।
2. State of Karnataka v. L. Muniswamy
सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायालय का कर्तव्य है कि वह निरर्थक एवं उत्पीड़नकारी अभियोजन को रोके।
यदि रिकॉर्ड से अपराध का आधार नहीं बनता, तो आरोपी को discharge किया जाना चाहिए।
महत्व
यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा पर बल देता है।
3. Dilawar Balu Kurane v. State of Maharashtra
सिद्धांत
न्यायालय ने कहा कि discharge के समय विस्तृत साक्ष्य परीक्षण नहीं किया जाएगा, परन्तु यह अवश्य देखा जाएगा कि आरोप केवल अनुमान पर आधारित तो नहीं हैं।
महत्व
Prima facie case की अवधारणा को स्पष्ट किया गया।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
धारा 199 BNSS का उद्देश्य निराधार अभियोजन रोकना है।
मजिस्ट्रेट उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय देता है।
पर्याप्त आधार न होने पर आरोपी रिहा किया जा सकता है।
आदेश कारणयुक्त होना चाहिए।
यह प्रावधान निष्पक्ष न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है।
धारा 199 BNSS, 2023
जहाँ कार्य किया गया हो या उसका परिणाम उत्पन्न हुआ हो वहाँ विचारण (Place of Inquiry or Trial)
Act Done Place∨Consequence Ensues Place⇒Jurisdiction for Trial
धारा 199 BNSS यह निर्धारित करती है कि जब कोई अपराध किसी कार्य (Act) के किए जाने तथा उसके परिणाम (Consequence) के उत्पन्न होने से बनता है, तब उस अपराध का विचारण (Trial) उस स्थान पर किया जा सकता है—
जहाँ वह कार्य किया गया हो; या
जहाँ उसका परिणाम उत्पन्न हुआ हो।
अर्थात् अपराध के कारण और परिणाम दोनों स्थानों को न्यायालयीय क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) प्राप्त होता है।
उद्देश्य
इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि अपराध का प्रभाव किसी दूसरे क्षेत्र में पड़ा हो, तो वहाँ की अदालत भी मामले की सुनवाई कर सके।
उदाहरण
उदाहरण 1
A ने जयपुर से किसी व्यक्ति को विष मिला पार्सल भेजा।
पीड़ित ने कोटा में उसे खाया और उसकी मृत्यु हो गई।
कार्य किया गया → जयपुर
परिणाम उत्पन्न हुआ → कोटा
अतः मुकदमा जयपुर या कोटा दोनों स्थानों पर चल सकता है।
उदाहरण 2
दिल्ली से ऑनलाइन धोखाधड़ी की गई और धनराशि उदयपुर के व्यक्ति के खाते से निकली।
धोखाधड़ी का कार्य → दिल्ली
परिणाम → उदयपुर
दोनों स्थानों की अदालतों को अधिकार होगा।
Flow Chart
अपराध करने का कार्य
↓
क्या परिणाम दूसरे स्थान पर उत्पन्न हुआ?
↓
┌────┴────┐
हाँ नहीं
↓ ↓
दोनों स्थानों कार्य वाले
को अधिकार स्थान पर ट्रायल
↓
Act Place + Consequence Place
दोनों में Inquiry / Trial
महत्वपूर्ण Landmark Judgments
1. State of Bihar v. Deokaran Nenshi
सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहाँ अपराध का प्रभाव या परिणाम उत्पन्न होता है, वहाँ की अदालत को भी अधिकार क्षेत्र प्राप्त हो सकता है।
महत्व
“Cause and Effect Jurisdiction” के सिद्धांत को मान्यता दी गई।
2. K. Bhaskaran v. Sankaran Vaidhyan Balan
सिद्धांत
न्यायालय ने कहा कि यदि अपराध के विभिन्न घटक अलग-अलग स्थानों पर घटित हों, तो उन सभी स्थानों की अदालतों को अधिकार क्षेत्र प्राप्त हो सकता है।
महत्व
Territorial Jurisdiction की व्यापक व्याख्या की गई।
3. Navinchandra N. Majithia v. State of Meghalaya
सिद्धांत
यदि अपराध का कोई भाग या उसका परिणाम किसी अन्य राज्य में उत्पन्न हो, तो उस राज्य की अदालत भी मामले की सुनवाई कर सकती है।
महत्व
Inter-State criminal jurisdiction को स्पष्ट किया गया।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु
धारा 199 BNSS “Place of Inquiry and Trial” से संबंधित है।
अपराध जहाँ किया गया हो तथा जहाँ उसका परिणाम हुआ हो — दोनों स्थानों पर ट्रायल संभव है।
यह धारा Territorial Jurisdiction को विस्तृत करती है।
साइबर अपराध, धोखाधड़ी, विषप्रयोग आदि मामलों में यह धारा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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