AI AND JUDICIARY PART 5 LAST PART
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधुनिक न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण सहायक तकनीक के रूप में उभर रही है। इसका उपयोग विधिक अनुसंधान, निर्णयों एवं नजीरों की खोज, दस्तावेजों के अनुवाद, प्रतिलेखन, मामलों के प्रबंधन तथा न्यायिक कार्यवाही को अधिक तेज और व्यवस्थित बनाने में किया जा सकता है। इससे न्याय तक पहुँच और न्यायिक दक्षता में सुधार संभव है।
किन्तु AI न्यायाधीश का विकल्प नहीं हो सकता। न्यायिक निर्णय केवल कानून के शब्दों पर आधारित नहीं होते, बल्कि साक्ष्य के मूल्यांकन, परिस्थितियों की समझ, संवैधानिक मूल्यों, प्राकृतिक न्याय और न्यायिक विवेक पर भी निर्भर करते हैं। AI के प्रयोग से निजता, गोपनीयता, पक्षपात, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा गलत या काल्पनिक विधिक जानकारी जैसी चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं। AI द्वारा उत्पन्न गलत न्यायिक निर्णयों अथवा संदर्भों की संभावना यह स्पष्ट करती है कि प्रत्येक AI-आधारित सूचना का प्रमाणिक विधिक स्रोतों से स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। Pooja Ramesh Singh v. Jammu & Kashmir Bank Ltd. (2026) में AI-जनित गलत विधिक सामग्री पर निर्भरता से जुड़े खतरे भी सामने आए।
अतः AI को न्यायपालिका में सहायक साधन के रूप में अपनाया जाना चाहिए, निर्णय लेने वाले प्राधिकारी के रूप में नहीं। तकनीक का प्रयोग संविधान, प्राकृतिक न्याय, न्यायिक स्वतंत्रता, निजता और विधिक नैतिकता के अनुरूप होना चाहिए। न्याय का अंतिम दायित्व मानव न्यायाधीश के विवेक और उत्तरदायित्व में ही रहना चाहिए।
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