Euthanasia
EUTHANASIA
भारत में इच्छामृत्यु की कानूनी स्थिति व्यक्ति के जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार के बीच संतुलन पर आधारित है। इच्छामृत्यु मुख्यतः दो प्रकार की होती है—सक्रिय इच्छामृत्यु और निष्क्रिय इच्छामृत्यु। सक्रिय इच्छामृत्यु में किसी व्यक्ति की मृत्यु कराने के उद्देश्य से घातक औषधि या इंजेक्शन दिया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में निर्धारित कानूनी एवं चिकित्सकीय प्रक्रिया के अंतर्गत जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना शामिल है। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है।
2018 के कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना। न्यायालय ने सक्षम व्यक्ति को जीवन-रक्षक उपचार से इनकार करने तथा अग्रिम चिकित्सकीय निर्देश या जीवन-वसीयत बनाने का अधिकार भी स्वीकार किया।
2026 के हरीश राणा बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने स्थायी वनस्पतिजन्य अवस्था में रह रहे व्यक्ति को दी जा रही चिकित्सकीय सहायता से पोषण और जल प्रदान करने की व्यवस्था को चिकित्सा उपचार माना तथा विशेष परिस्थितियों में उसे वापस लेने की अनुमति दी। न्यायालय ने रोगी के सर्वोत्तम हित, उपचार से होने वाले वास्तविक चिकित्सकीय लाभ, उपचार के निष्फल हो जाने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय और परिवार से परामर्श जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना। साथ ही, रोगी के लिए उचित पीड़ानिवारक तथा जीवन के अंतिम चरण की देखभाल सुनिश्चित करने पर भी बल दिया।
अतः भारत में किसी व्यक्ति की मृत्यु प्रत्यक्ष रूप से कराने का अधिकार अभी मान्य नहीं है, लेकिन निर्धारित सुरक्षा-उपायों के अधीन गरिमा के साथ मृत्यु तथा अनावश्यक जीवन-रक्षक उपचार से इनकार करने या उसे वापस लेने का अधिकार संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करता है। इस प्रकार, भारतीय विधि व्यक्ति के जीवन के अधिकार के साथ उसकी गरिमा, स्वायत्तता और अनावश्यक चिकित्सा हस्तक्षेप से मुक्ति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
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