Question 12 Hindi medium
प्रश्न 12
विक्रय-वस्तु अधिनियम, 1930 की धारा 45, 46 एवं 47 के अंतर्गत अवैतनिक विक्रेता के माल संबंधी अधिकारों के प्रावधानों की व्याख्या कीजिए। अवैतनिक विक्रेता कौन है तथा उसके माल के संबंध में क्या-क्या अधिकार हैं?
उत्तर:
धारा 45 — अवैतनिक विक्रेता (Unpaid Seller):
धारा 45 के अनुसार, विक्रेता को अवैतनिक विक्रेता तब माना जाता है जब—
माल का पूरा मूल्य विक्रेता को भुगतान या निविदत्त (tender) नहीं किया गया हो; या
भुगतान के रूप में प्राप्त विनिमय-पत्र (Bill of Exchange) या अन्य परक्राम्य लिखत (Negotiable Instrument), जो सशर्त भुगतान के रूप में प्राप्त हुई थी, अनादरित (dishonoured) हो गई हो।
धारा 46 — अवैतनिक विक्रेता के माल संबंधी अधिकार
धारा 46 के अंतर्गत अवैतनिक विक्रेता को माल के संबंध में मुख्यतः निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं—
अधिकार-ए-धारण (Right of Lien):
विक्रेता को माल का कब्जा अपने पास बनाए रखने का अधिकार है, जब तक कि माल का मूल्य प्राप्त न हो जाए।मार्ग में रोकने का अधिकार (Right of Stoppage in Transit):
यदि माल खरीदार को भेजे जाने के बाद मार्ग में है और खरीदार दिवालिया हो जाता है, तो विक्रेता माल को मार्ग में रोककर उसका कब्जा पुनः प्राप्त कर सकता है।पुनः विक्रय का अधिकार (Right of Resale):
कुछ परिस्थितियों में अवैतनिक विक्रेता माल को पुनः बेच सकता है।
धारा 47 — धारणाधिकार (Right of Lien)
धारा 47 के अनुसार, अवैतनिक विक्रेता को माल पर धारणाधिकार तब प्राप्त होता है जब—
माल बिना किसी उधार (Credit) की शर्त के बेचा गया हो;
माल उधार पर बेचा गया हो, लेकिन उधार की अवधि समाप्त हो गई हो; या
खरीदार दिवालिया हो गया हो।
निष्कर्ष
अतः, धारा 45 अवैतनिक विक्रेता की परिभाषा प्रदान करती है, जबकि धारा 46 उसके माल संबंधी प्रमुख अधिकारों को बताती है और धारा 47 धारणाधिकार (Lien) की परिस्थितियों को स्पष्ट करती है। इन प्रावधानों का उद्देश्य अवैतनिक विक्रेता के हितों की रक्षा करना है।
Comments
Post a Comment